शिवनंदनपुर जीत गए, लेकिन मुख्यमंत्री जी... पूरा छत्तीसगढ़ अभी बाकी है!
रायपुर। शिवनंदनपुर नगर पंचायत की जीत पर भाजपा खुश है और होना भी चाहिए। जिस चुनाव में कांग्रेस ने भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव, दीपक बैज जैसे बड़े-बड़े नेताओं को उतार दिया हो, उसे जीतना छोटी बात नहीं होती। इसलिए जश्न तो बनता है। लेकिन राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है, जब एक जीत पूरे युद्ध की तस्वीर छिपा दे।
कांग्रेसी दिग्गजों के मैदान में उतरने के बाद शिवनंदनपुर में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपना भरोसेमंद पत्ता खेला। कहते हैं, वहां समीकरण बिगड़े हुए थे, नाराजगी थी, कांग्रेस पूरी ताकत से लगी हुई थी। ऐसे समय में मुख्यमंत्री की तरफ से उनके ओएसडी डॉ. रविकांत मिश्रा ने समन्वय, संवाद और रणनीति बनाने का काम संभाला। सीएमओ यानी मुख्यमंत्री कार्यालय से मार्गदर्शन लेते हुए योजनाओं,मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया, मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े सहित सरकार के मंत्रियों और संगठन के वरिष्ठजनों की समय-समय पर उपस्थित के पश्चात परिणाम भाजपा के पक्ष में आया।
परंतु जिस रणनीति के साथ उन्होंने शिवनंदनपुर में जीत दर्ज की वैसी रणनीति कही और दिखाई नहीं दी। क्योंकि उपचुनावों के नतीजे यह भी बता रहे हैं कि तस्वीर उतनी एकतरफा नहीं है, जितनी शिवनंदनपुर से दिखाई देती है। कई जगह कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी, कई सीटें भाजपा के हाथ से निकलीं और शहरी क्षेत्रों में भी भाजपा को अपेक्षा के अनुरूप सफलता नहीं मिली।
निः संदेह शिवनंदनपुर में भाजपा ने समीकरण साध दिए, नाराजगी कम कर दी और चुनावी बिसात पलट दी। लेकिन बस्तर, रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, कोरबा और बाकी छत्तीसगढ़ में भी अलग-अलग तरह की चुनौतियां खड़ी हैं। वहां सिर्फ रणनीति नहीं, संगठन, सरकार की छवि और स्थानीय नेतृत्व की क्षमता भी परीक्षा में है।
इसलिए शिवनंदनपुर की जीत पर जश्न जरूर मनाइए, लेकिन आत्ममुग्ध मत होइएगा। यह जीत बताती है कि सही रणनीति से मुश्किल चुनाव जीते जा सकते हैं। वहीं बाकी नतीजे यह भी बता रहे हैं कि भाजपा के लिए सब कुछ उतना आसान नहीं है जितना सत्ता के गलियारों में दिखाई देता है।
शिवनंदनपुर में फॉर्मूला चल गया, लेकिन मुख्यमंत्री जी अगर पूरे छत्तीसगढ़ में विजय पताका फहराना चाहते हैं, तो उन्हें सिर्फ एक जीत नहीं, पूरे प्रदेश के संकेतों को पढ़ना होगा। भाजपा संगठन में बढ़ रही कमजोरी को समझना होगा। प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं की भी परवाह करनी होगी। संगठन से बात कर अपने अधिकारों का प्रयोग करके सैकड़ो कार्यकर्ताओं को सत्ता में भागीदारी देनी होगी। क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ी भूल हार से नहीं, जीत के बाद पैदा हुए आत्मविश्वास से होती है।
- एस.कैलाश