विश्व पर्यावरण दिवस: सनातन परंपरा का संदेश, प्रकृति ही परम पूज्य
विश्व पर्यावरण दिवस विशेष: पीपल से गंगा तक, सनातन संस्कृति का हर मंत्र पर्यावरण के नाम
विश्व आज पर्यावरण संरक्षण की चिंता में डूबा हुआ है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ता प्रदूषण, घटते वन और जल संकट मानव सभ्यता के सामने गंभीर चुनौती बनकर खड़े हैं। वैज्ञानिक आज लोगों से वृक्ष लगाने, जल बचाने और प्रकृति के संरक्षण का आह्वान कर रहे हैं। यह निस्संदेह आवश्यक भी है, किंतु भारतीय सनातन संस्कृति के लिए यह कोई नई सीख नहीं है। जिस विषय को आधुनिक विज्ञान आज मानव अस्तित्व की शर्त बता रहा है, उसे हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पहले जीवन का आधार मानकर धर्म और आस्था से जोड़ दिया था।
सनातन धर्म संसार का ऐसा जीवन-दर्शन है जिसका न आदि है और न अंत। इसमें प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि साक्षात् देवत्व का स्वरूप माना गया है। हमारे यहां धरती को "माता" कहा गया, नदियों को "देवी" का स्थान मिला, सूर्य को जीवनदाता और अग्नि को पवित्रता का प्रतीक माना गया। वायु, जल, आकाश, अग्नि और पृथ्वी। इन पंचमहाभूतों को सृष्टि का आधार बताकर उनकी पूजा और सम्मान की परंपरा विकसित की गई। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था, बल्कि प्रकृति संरक्षण का अत्यंत वैज्ञानिक और व्यावहारिक मार्ग था।
भारतीय समाज में पीपल, बरगद, नीम, तुलसी जैसे वृक्षों को पूजनीय माना गया। वट सावित्री, तुलसी विवाह, आंवला नवमी और हरियाली से जुड़े अनेक पर्व केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के माध्यम हैं। जिस पीपल को हमारे पूर्वजों ने पूजनीय माना, आज विज्ञान उसे प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष बताता है। जिस जल को हमारे धर्मग्रंथों ने पवित्र कहा, आज वैज्ञानिक उसके संरक्षण को मानव जीवन की अनिवार्यता मान रहे हैं।
सनातन परंपरा केवल वृक्षों और नदियों तक सीमित नहीं है। यहां गौ, नाग, वानर, हाथी और अनेक जीव-जंतुओं को भी सम्मान और संरक्षण का स्थान मिला है। यह भावना सिखाती है कि प्रकृति का प्रत्येक जीव सृष्टि के संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक अंग मानता है, तभी वास्तविक पर्यावरण संरक्षण संभव होता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पर्यावरण बचाने के लिए केवल सरकारी अभियानों या एक दिन के कार्यक्रमों तक सीमित न रहें, बल्कि अपनी उन सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटें जिन्होंने सदियों तक प्रकृति और मानव के बीच संतुलन बनाए रखा। हमारी परंपराएं हमें सिखाती हैं कि प्रकृति का शोषण नहीं, उसका सम्मान और संरक्षण ही मानव कल्याण का मार्ग है।
विश्व पर्यावरण दिवस पर यह स्मरण करना आवश्यक है कि भारत की सनातन संस्कृति ने सदियों पहले ही वह मार्ग दिखा दिया था, जिसकी ओर आज पूरा विश्व बढ़ने का प्रयास कर रहा है। यदि हम अपनी संस्कृति, अपने संस्कार और अपनी आस्था में निहित प्रकृति-प्रेम को पुनः जीवन में उतार लें, तो पर्यावरण संरक्षण कोई अभियान नहीं, बल्कि जीवन शैली बन जाएगा। प्रकृति की रक्षा केवल भविष्य की पीढ़ियों के लिए नहीं, बल्कि स्वयं मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। और इस सत्य को सनातन परंपरा ने बहुत पहले समझ लिया था।
-देवेंद्र किशोर गुप्ता