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MP राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन पर हाईकोर्ट की रोक, सरकार ने माना प्रक्रिया में कानूनी खामियां

ग्वालियर। मध्य प्रदेश सरकार की राज्य परिवहन प्राधिकरण यानी एसटीए (STA) के पुनर्गठन को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। ग्वालियर हाईकोर्ट ने एसटीए के पुनर्गठन पर अंतरिम रोक लगा दी है। सुनवाई के दौरान सरकार ने खुद माना कि पूरी प्रक्रिया में कानूनी खामियां रह गई थीं। वहीं हाईकोर्ट ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह से भी जवाब तलब किया है। इस पूरे मामले में यह आशंका भी जताई जा रही है कि एसटीए का कामकाज ग्वालियर से भोपाल शिफ्ट किया जा सकता है।

प्रक्रिया में कानूनी त्रुटियां, तीन महीने का मांगा समय

दरअसल राज्य परिवहन प्राधिकरण के पुनर्गठन को लेकर जारी अधिसूचना अब कानूनी विवाद में घिर गई है। ग्वालियर हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 9 फरवरी 2026 को जारी अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी। सुनवाई के दौरान राज्य शासन ने कोर्ट में स्वीकार किया कि पुनर्गठन की प्रक्रिया में कानूनी त्रुटियां रह गई थीं। सरकार ने इन्हें दूर करने के लिए तीन महीने का समय भी मांगा है। हाईकोर्ट ने इस मामले में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मनीष सिंह से भी जवाब मांगा है।

याचिकाकर्ताओं को ग्वालियर से भोपाल ट्रांसफर करने की आशंका

याचिकाकर्ताओं, अधिवक्ताओं और बस ऑपरेटरों का कहना है कि पुनर्गठन के जरिए राज्य परिवहन प्राधिकरण का कामकाज ग्वालियर से भोपाल ट्रांसफर करने की कोशिश हो सकती है। हालांकि शासन की ओर से ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन इसी आशंका को लेकर विवाद गहराया हुआ है। यदि ऐसा होता है तो प्रदेशभर के बस ऑपरेटरों और परमिट से जुड़े मामलों के लिए नई प्रशासनिक व्यवस्था का सामना करना पड़ सकता है। याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत परिवहन विभाग के सचिव को प्राधिकरण की संरचना में शामिल किया गया है। साथ ही वही अधिकारी राज्य सड़क परिवहन निगम के प्रबंध निदेशक भी हैं, जिससे हितों के टकराव की स्थिति बनती है।

अधिकारियों के जवाब पर कोर्ट करेगी फैसला

कोर्ट अब इस पूरे मामले की अगली सुनवाई में सरकार और संबंधित अधिकारियों के जवाब पर फैसला करेगा। फिलहाल एसटीए के पुनर्गठन पर हाईकोर्ट की रोक बरकरार है। सरकार को कानूनी खामियों को दूर करने के लिए समय मिला है, जबकि पूरे मामले पर अब सभी की नजर 24 जून को होने वाली अगली सुनवाई और हाईकोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हुई है।