86 दिन की देरी पड़ी भारी, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की रिट अपील खारिज की
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रक्रिया में समय-सीमा का पालन सरकारी विभागों के लिए भी उतना ही अनिवार्य है जितना किसी आम नागरिक के लिए। इसी सिद्धांत को आधार बनाते हुए अदालत ने राज्य सरकार द्वारा विलंब से दायर की गई रिट अपील को सुनवाई योग्य मानने से इनकार कर दिया।
मामला जेल विभाग से जुड़े एक सेवा विवाद का है। राज्य शासन, जेल एवं सुधारात्मक सेवा विभाग और केंद्रीय जेल जगदलपुर प्रशासन ने एकलपीठ के आदेश को चुनौती देते हुए खंडपीठ में अपील प्रस्तुत की थी। हालांकि यह अपील निर्धारित समयावधि समाप्त होने के काफी बाद दाखिल की गई थी।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि आदेश की प्रति प्राप्त होने के बाद फाइल विभिन्न विभागों और कार्यालयों में विचाराधीन रही। कानूनी सलाह लेने, प्रशासनिक स्वीकृति प्राप्त करने तथा आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने में समय लगने के कारण अपील समय पर दाखिल नहीं हो सकी।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी. रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि केवल विभागीय प्रक्रियाएं, फाइलों का एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय तक जाना अथवा प्रशासनिक औपचारिकताएं विलंब को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकतीं।
खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि सर्वोच्च न्यायालय कई अवसरों पर स्पष्ट कर चुका है कि सरकारी संस्थाओं को देरी माफी का कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है। यदि निर्धारित अवधि के भीतर अपील दाखिल नहीं की जाती है तो उसके लिए ठोस और असाधारण परिस्थितियों का उल्लेख आवश्यक है।
अदालत ने पाया कि राज्य सरकार यह बताने में असफल रही कि समय-सीमा के भीतर अपील दायर करने के लिए कौन से गंभीर और त्वरित प्रयास किए गए थे। रिकॉर्ड में केवल विभागीय पत्राचार और फाइलों की आवाजाही का उल्लेख किया गया था।
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने देरी माफी का आवेदन खारिज कर दिया। इसके साथ ही रिट अपील भी केवल विलंब और लापरवाही के आधार पर निरस्त कर दी गई। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की।
गौरतलब है कि यह विवाद मुंगेली जिला जेल में पदस्थ जेल वार्डर संजय कुमार साहू से संबंधित है। उनके पक्ष में एकलपीठ द्वारा नवंबर 2025 में आदेश पारित किया गया था, जिसके खिलाफ राज्य सरकार ने अपील दायर की थी। लेकिन निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बाद अपील प्रस्तुत किए जाने से सरकार को अदालत से राहत नहीं मिल सकी।