छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में नई रोस्टर व्यवस्था लागू, चार डिवीजन और 14 सिंगल बेंच करेंगी सुनवाई
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में समर वेकेशन से पहले रोस्टर व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। गुरुवार से नई न्यायिक व्यवस्था प्रभावी हो गई है, जिसके तहत चार डिवीजन बेंच और 14 सिंगल बेंच नियमित रूप से विभिन्न मामलों की सुनवाई करेंगी। हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा जारी नई रोस्टर सूची के अनुसार न्यायाधीशों के बीच मामलों का विषयवार विभाजन किया गया है, ताकि न्यायिक कार्यों का निष्पादन अधिक व्यवस्थित और प्रभावी ढंग से हो सके।
नई व्यवस्था के तहत प्रथम डिवीजन बेंच में मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र अग्रवाल शामिल रहेंगे। यह बेंच जनहित याचिकाओं, हेबियस कॉर्पस, रिट अपीलों तथा विशेष श्रेणी के महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करेगी। माना जा रहा है कि संवैधानिक और सार्वजनिक महत्व के मामलों को इस बेंच में प्राथमिकता दी जाएगी।
दूसरी डिवीजन बेंच में जस्टिस संजय के अग्रवाल और जस्टिस संजय जायसवाल को जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह बेंच मुख्य रूप से आपराधिक मामलों और अल्ट्रा वायर्स से जुड़े मामलों की सुनवाई करेगी। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह बेंच कई महत्वपूर्ण आपराधिक मामलों और संवैधानिक व्याख्याओं से जुड़े मामलों पर निर्णय दे सकती है।
तीसरी डिवीजन बेंच में जस्टिस संजय अग्रवाल और जस्टिस एनके व्यास को कैदी अपीलों से जुड़े मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी दी गई है। इस बेंच में जेल अपील, सजा के खिलाफ याचिकाएं और बंदियों से संबंधित अन्य मामलों पर सुनवाई होगी।
वहीं चौथी डिवीजन बेंच में जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत शामिल होंगे। यह बेंच वैवाहिक अपील, कर संबंधी विवाद और सेवा मामलों की सुनवाई करेगी। सरकारी कर्मचारियों से जुड़े सेवा विवादों और टैक्स मामलों की बड़ी संख्या को देखते हुए इस बेंच को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसके अलावा हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश की विशेष सिंगल बेंच सहित कुल 14 सिंगल बेंच भी कार्यरत रहेंगी। इन सिंगल बेंचों में अलग-अलग प्रकार के दीवानी, फौजदारी, सेवा, कर, शिक्षा और प्रशासनिक मामलों की नियमित सुनवाई की जाएगी। नई रोस्टर व्यवस्था को लेकर अधिवक्ताओं और न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि इससे मामलों के शीघ्र निपटारे में मदद मिलेगी। समर वेकेशन से पहले लंबित मामलों की सुनवाई को गति देने और न्यायिक कार्यों में संतुलन बनाए रखने के उद्देश्य से यह बदलाव किया गया है।