प्रदेश / छत्तीसगढ़

पत्रकारिता की आड़ में हिंसा — लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर कलंक

रायपुर।  छत्तीसगढ़ में जनसंपर्क विभाग के एक अधिकारी के साथ एक कथित पत्रकार द्वारा की गई मारपीट की घटना ने पूरे मीडिया जगत को झकझोर दिया है। यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पत्रकारिता की साख पर गहरा आघात है।

पत्रकारिता सदैव संवाद, विवेक और सत्य की खोज का माध्यम रही है — न कि दबाव, धमकी या हिंसा का। जिस पेशे की बुनियाद सवाल पूछने और जवाब खोजने पर टिकी है, वहाँ हिंसक व्यवहार का कोई स्थान नहीं हो सकता।

इस घटना ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा किया है — क्या अब पत्रकारिता के नाम पर गुंडागर्दी और व्यक्तिगत स्वार्थ का खेल खुलेआम चलने लगा है?
अगर हाँ, तो यह प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक संकेत है।

जनसंपर्क विभाग के अधिकारी जनता और शासन के बीच संवाद का माध्यम हैं। उनके साथ हुई मारपीट, सिर्फ प्रशासनिक अनुशासन का उल्लंघन नहीं, बल्कि सभ्यता की मर्यादाओं की भी हत्या है।
असहमति और आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार हैं, पर हिंसा कभी भी अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं हो सकती। ऐसी घटनाएँ न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को अस्थिर करती हैं, बल्कि सच्चे और ईमानदार पत्रकारों की छवि को भी धूमिल करती हैं।

राज्य सरकार को चाहिए कि ऐसे मामलों में शून्य सहिष्णुता की नीति (Zero Tolerance Policy) अपनाए।
पत्रकार संगठनों को भी आत्ममंथन करना होगा कि ऐसे “कथित पत्रकार” आखिर क्यों और कैसे इस पवित्र पेशे का मुखौटा पहनकर दबंगई पर उतर आते हैं।

सच्ची पत्रकारिता वह है जो जनहित में सवाल पूछे, व्यवस्था को आईना दिखाए, और समाज में संवाद की संस्कृति को मजबूत करे।
हिंसा, अहंकार और सत्ता-प्रदर्शन से पत्रकारिता नहीं, उसकी आत्मा मरती है।

मै इस घटना की कड़ी भर्त्सना करता है और उम्मीद करता हूं कि सरकार, पुलिस और मीडिया संगठन मिलकर ऐसी प्रवृत्तियों पर सख्त कार्रवाई करें — ताकि पत्रकारिता की गरिमा और विश्वसनीयता बनी रहे।

देवेंद्र किशोर गुप्ता