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शिक्षा सचिव के एफिडेविट से हाईकोर्ट से नाराज, विस्तृत रुप से जानकारी देने का दिया निर्देश

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य में बिना मान्यता के चल रहे प्री-प्राइमरी और नर्सरी स्कूलों के मुद्दे पर एक बार फिर सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। मुख्य न्यायाधीश रमेश कुमार सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान शिक्षा सचिव द्वारा दाखिल शपथपत्र को असंतोषजनक बताते हुए नया, विस्तृत जवाब पेश करने के निर्देश दिए।

दरअसल, जनहित याचिका में यह मुद्दा उठाया गया था कि प्रदेश में 330 से अधिक नर्सरी और प्री-प्राइमरी स्कूल बिना किसी मान्यता के संचालित हो रहे हैं, जिससे हजारों बच्चों का भविष्य संकट में पड़ सकता है। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार ने बिना ठोस कारण बताए जनवरी 2013 के उस सर्कुलर को वापस ले लिया, जो ऐसे स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई का आधार था। कोर्ट ने पूछा कि आखिर क्यों उस आदेश को निरस्त किया गया, जबकि उसी सर्कुलर के तहत स्कूलों की मान्यता प्रक्रिया तय थी।

सचिव का जवाब — 2013 का सर्कुलर आरटीई के अनुरूप नहीं

शिक्षा सचिव ने हाईकोर्ट के निर्देश पर दाखिल अपने व्यक्तिगत शपथपत्र में बताया कि 23 सितंबर 2025 को 2013 वाला सर्कुलर इसलिए रद्द किया गया क्योंकि वह ‘निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act)’ के अनुरूप नहीं था। सचिव ने कहा कि आरटीई अधिनियम केवल कक्षा 1 से 8 तक और 6 से 14 वर्ष के बच्चों पर लागू होता है, जबकि 2013 का सर्कुलर प्री-नर्सरी और नर्सरी स्तर के बच्चों से जुड़ा था।

इसके साथ ही यह भी कहा गया कि पुराने सर्कुलर में बिना पंजीकरण या मान्यता के चल रहे स्कूलों पर कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं था, इसलिए उसे रद्द कर नई नीति के तहत काम करने का निर्णय लिया गया है।

नई नीति पर काम जारी — बनी सात सदस्यीय समिति

शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि नई शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप निजी प्री-स्कूलों के लिए नियामक दिशा-निर्देश तैयार करने हेतु सात सदस्यीय समिति गठित की गई है। यह समिति बच्चों की सुरक्षा, गुणवत्ता और निगरानी से जुड़े मानकों पर मसौदा तैयार कर चुकी है, जो फिलहाल विचाराधीन है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी — बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हुई तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई करें

हाईकोर्ट ने शिक्षा सचिव के जवाब को अपर्याप्त मानते हुए कहा कि यदि सर्कुलर वापस लेने से बच्चों की पढ़ाई या उनके भविष्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, तो राज्य सरकार उन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करे, जिन्होंने नियमों के विपरीत स्कूलों को चलने दिया। साथ ही सरकार को निर्देश दिया गया कि वह जल्द से जल्द नए नियम बनाकर हाईकोर्ट को सूचित करे।

हजारों छात्रों के सामने संकट

याचिकाकर्ता सीवी भगवंत राव की ओर से अधिवक्ता देवर्षि ठाकुर ने दलील दी कि चूंकि ये स्कूल बिना मान्यता के संचालित हो रहे थे, इसलिए यहां से पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों को कक्षा 1 में प्रवेश के समय वैध प्रमाणपत्र न मिलने से परेशानी हो सकती है।

सुनवाई अब छह हफ्ते बाद

हाईकोर्ट ने अगली सुनवाई छह हफ्ते बाद निर्धारित की है। तब तक शिक्षा सचिव को नया, विस्तृत शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें सर्कुलर वापस लेने के स्पष्ट कारणों, मौजूदा स्थिति और नई नीति की प्रगति की जानकारी शामिल होनी चाहिए।