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एनआईटी रायपुर प्रकरण: हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार को पद से हटाने का आदेश रद्द किया, प्रक्रिया को बताया अवैधानिक

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) रायपुर के रजिस्ट्रार पद से डॉ. आरिफ खान को हटाने संबंधी आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि संस्थान द्वारा लिया गया यह निर्णय न तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप था और न ही वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए पारित किया गया था। हालांकि, यह देखते हुए कि डॉ. आरिफ खान वर्तमान में सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर में वित्त अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं, कोर्ट ने उनकी एनआईटी रायपुर में पुनर्बहाली का आदेश नहीं दिया। इसके साथ ही अदालत ने उन्हें यह स्वतंत्रता प्रदान की कि वे अपनी सेवा के लिए उपयुक्त संस्थान का विकल्प स्वयं चुन सकते हैं।

यह मामला 23 फरवरी 2023 को एनआईटी रायपुर के निदेशक द्वारा जारी उस आदेश से जुड़ा है, जिसके माध्यम से डॉ. आरिफ खान को रजिस्ट्रार पद पर बनाए नहीं रखने का निर्णय लिया गया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए डॉ. खान ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में उन्होंने कहा कि यह आदेश मनमाना है और बिना उन्हें कोई सुनवाई का अवसर दिए पारित किया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन है।

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि रजिस्ट्रार पद के लिए 24 जनवरी 2020 को विज्ञापन जारी किया गया था। कोविड-19 महामारी के कारण चयन प्रक्रिया में विलंब जरूर हुआ, लेकिन भर्ती नियम 2019 के तहत विधिवत चयन समिति गठित कर पूरी प्रक्रिया पूरी की गई। इन नियमों के अनुसार रजिस्ट्रार का पद पांच वर्ष की निश्चित अवधि के लिए होता है। इसी वैधानिक प्रक्रिया के तहत 22 फरवरी 2021 को डॉ. आरिफ खान की नियुक्ति की गई और उन्होंने 24 फरवरी 2021 को अपना कार्यभार संभाला।

मामले में आगे बताया गया कि 25 फरवरी 2022 को बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की 52वीं बैठक में डॉ. खान के कार्य निष्पादन की समीक्षा की गई थी। विस्तृत विचार-विमर्श के बाद बोर्ड ने उनके कार्य को संतोषजनक मानते हुए उनकी नियुक्ति को पांच वर्ष की अवधि के लिए पुष्टि करने का निर्णय लिया। इसकी जानकारी 10 मार्च 2022 को उन्हें दे दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया। इस स्थिति से आहत होकर डॉ. खान ने संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अभ्यावेदन भी प्रस्तुत किया था।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि देश के अन्य एनआईटी संस्थानों, जैसे एनआईटी श्रीनगर और एनआईटी सूरत में रजिस्ट्रारों की नियुक्तियां नियमों के अनुसार पांच वर्ष की अवधि के लिए की गई हैं, जबकि एनआईटी रायपुर में उनके साथ अलग और असमान व्यवहार किया गया। इसे समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया गया।

मामले की सुनवाई जस्टिस ए. के. प्रसाद की सिंगल बेंच में हुई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में डॉ. खान की पुनर्बहाली का आदेश देना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि 23 फरवरी 2023 का आदेश प्रक्रियात्मक अनियमितताओं से ग्रस्त था और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करता था। इसी आधार पर कोर्ट ने उक्त आदेश को रद्द करते हुए याचिका का निराकरण कर दिया।