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देश की सबसे बड़ी गेवरा कोल माइंस में सुरक्षा पर सवाल ! बढ़ते हादसों पर DGMS ने उठाये गंभीर सवाल, 15 दिनों में प्रबंधन से मांगी रिपोर्ट

कोरबा। कोयला उत्पादन में कीर्तिमान हासिल करने वाली SECL की खदानें सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही है। ताजा मामला देश की सबसे बड़ी कोयला खदानों में सुमार एसईसीएल के गेवरा कोल परियोजना की है। यहां सुरक्षा नियमों की अनदेखी अब महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि एक खतरनाक प्रवृत्ति बनती जा रही है। खदान में बढ़ते हादसों और जोखिम भरे हालात के बीच DGMS की ताज़ा निरीक्षण रिपोर्ट ने प्रबंधन की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। खान एवं सुरक्षा महानिदेशालय ने गेवरा प्रबंधन को नोटिस जारी कर 15 दिनों में रिपोर्ट मांगी है।

गौरतलब है कि कोरबा जिले में एसईसीएल की मेगा प्रोजक्ट गेवरा, कुसमुुंडा और दीपका परियोजना संचालित है। इन परियोजनाओं में रिकार्ड कोयला उत्पादन के साथ ही सुरक्षा मानकों को दरकिनार कर अक्सर मानव जीवन के साथ गंभीर खिलवाड़ के भी मामले सामने आते रहे है। जिसे लेकर खान एवं सुरक्षा महानिदेशालय(DGMS) ने कड़ा रूख अपनाया है। DGMS ने एसईसीएल गेवरा माइंस में लगातार बढ़ती दुर्घटनाओं और सुरक्षा मानकों की अनदेखी पर प्रबंधन की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाये है।

एसईसीएल गेवरा प्रबंधन को डीजीएमएस से जारी पत्र में उल्लेख किया गया है कि 13 और 14 जनवरी को DGMS बिलासपुर के सुरक्षा उपनिदेशक द्वारा माइंस का निरीक्षण किया गया था। जिसमें कोयला खदान विनियम 2017 के कई प्रावधानों का खुला उल्लंघन पाया गया। DGMS ने सवाल उठाते हुए कहा है कि…..यह स्थिति तब है, जब गेवरा खदान को उत्पादन के लिहाज से देश की अग्रणी परियोजनाओं में गिना जाता है। सवाल यह है कि जब उत्पादन लक्ष्य पूरे करने की होड़ है, तो क्या श्रमिकों की सुरक्षा को दरकिनार किया जा रहा है ?

खदान में उड़ते धूल पर जतायी चिंता, कहा…ये पर्यावण के साथ खिलवाड़

DGMS के निरीक्षण में पाया गया कि गेवरा खदान के कोयला स्टॉक यार्ड A और B के आसपास धूल नियंत्रण के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। सड़कों पर नियमित पानी का छिड़काव नहीं किया जा रहा था और अधिकांश फॉग कैनन खराब हालत में पड़े थे। यह सीधे तौर पर श्रमिकों के स्वास्थ्य और आसपास के पर्यावरण के साथ खिलवाड़ है। धूल के बढ़ते स्तर से न केवल फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ता है, बल्कि दृश्यता कम होने से दुर्घटनाओं की आशंका भी बढ़ जाती है।

बगैर तिरपाल ढके खदानों में निकल रहे ट्रकों पर उठाये सवाल

DGMS ने गेवरा खदान के निरीक्षण के दौरान खदान में व्याप्त प्रदूषण के साथ ही सड़क मार्ग से होने वाले कोयला परिवहन में भी प्रबंधन की उदासीनता देखी। जांच में पाया गया कि खदान से ट्रकों और टिपरों में लोड कोयला को तिरपाल से पूरी तरह से ढंके बगैर ही रवाना किया जा रहा था। एसईसीएल गेवरा परियोजना की इस गंभीर लापरवाही पर DGMS ने सवाल उठाते हुए पूछा है कि… क्या प्रबंधन को यह अहसास नहीं कि यह न सिर्फ नियमों का उल्लंघन है, बल्कि आम जनता और राहगीरों की जान को भी जोखिम में डालने जैसा है ? वहीं DGMS ने निरीक्षण के दौरान लोडिंग क्षेत्र और वेब्रिज के आसपास अनाधिकृत व्यक्तियों की मौजूदगी पर सवाल उठाते हुए इससे खदान क्षेत्र में कभी भी बड़ा हादसा होने की चिंता व्यक्त की है।

पार्किंग यार्ड और स्टॉक क्षेत्र में ट्रकों की बेतहाशा भीड़ पर उठाये सवाल

DGMS ने पार्किंग यार्ड और स्टॉक क्षेत्र में ट्रकों की बेतहाशा भीड़ पर सवाल उठये है। डीजीएमएस ने पत्र में कहा है कि इस अव्यवस्था ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। बिना सुव्यवस्थित प्रणाली के भारी वाहनों का संचालन कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकता है। DGMS ने प्रति शिफ्ट ट्रकों की सीमा तय करने, कम्प्यूटरीकृत टोकन सिस्टम और सीसीटीवी निगरानी लागू करने के निर्देश दिए हैं।

क्या 15 दिन में सुधर जायेंगे हालात, या फिर कागजी कार्रवाई कर की जायेगी खानापूर्ति

DGMS के इस एक्शन के बाद गेवरा प्रबंधन के जवाबदार अधिकारियों के बीच हड़कंप मचा हुआ है। लेकिन इस खुलासे और DGMS के संज्ञान के बाद सवाल अब भी वही….कि क्या 15 दिनों में खदान में व्याप्त अव्यवस्था और सुरक्षा मानकों में कमी पूरी तरह से सुधर जायेंगी ? स्थानीय स्तर पर बढ़ते हादसों को लेकर पहले भी आवाज़ें उठती रही हैं। अब DGMS की सख्ती के बाद साफ हो गया है कि खदान में सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर प्रबंधन की गंभीर खामियां मौजूद हैं।

खान सुरक्षा निदेशक ने भले ही 15 दिनों के भीतर सभी उल्लंघनों का निराकरण कर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इन 15 दिनों में केवल कागज़ी सुधार होंगे ? या जमीनी स्तर पर भी बदलाव दिखेगा ? यदि कोयला खदानों में अब भी सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो उत्पादन की चमक के पीछे मानव जीवन और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ होते रहेंगे। ऐस में अब ये देखने वाली बात होगी कि DGMS के कड़े तेवर का गेवरा परियोजना के साथ ही दूसरी खदानों पर कितना असर पड़ता है, ये तो आने वाला वक्त ही बतायेगा।